अग्निवीरों के लिए दुल्हन नहीं’: राजस्थान की ‘शहीदों की नगरी’ में डिफेंस कोचिंग से किनारा करने के कारण

चिड़ावा (झुंझुनू): शेखावाटी डिफेंस अकादमी के विशाल, लेकिन वीरान हॉस्टल के एक कमरे में केवल दो किशोर रह रहे हैं, जबकि बाकी कमरे बंद हैं या खाली हैं. कमरे में रखे बेंचों और मेज पर ‘धूल’ जमी थी.

 

कभी सेना में सूबेदार रहे सुरिंदर सिंह जो कि अब हॉस्टल के प्रबंधक और वार्डन हैं, ने बताया, राजस्थान के चिड़ावा में झुंझुनू रोड पर सेना के आकांक्षियों के लिए बने कोचिंग सेंटर, शेखावाटी डिफेंस अकादमी में सरकार द्वारा 2022 में अग्निपथ योजना शुरू करने के बाद से उतने छात्र नहीं हैं, जितने पहले हुआ करते थे.

जब अधिकारी स्तर से निचली रैंक की बात आती है तो अग्निपथ योजना अब सेना में सेवा देने का एकमात्र मार्ग है, लेकिन, योजना के तहत भर्ती किए गए अग्निवीर केवल चार साल तक सेवाएं दे पाएंगे, जिसके बाद केवल 25 प्रतिशत ही नियमित सेवा में बने रहेंगे. यह डिफेंस कोचिंग संस्थानों के लिए सबसे बड़ी बाधा, जहां छात्रों के दाखिले में गिरावट आ रही है.

शेखावाटी डिफेंस अकादमी में अंग्रेज़ी मीडियम का कोर्स लेने वाले दो छात्रों में से एक, अनुज, झुंझुनू की उदयपुरवाटी तहसील के मैनपुरा गांव से हैं – यह जिला अपने सबसे ज्यादा लोगों को सेना में भेजने के कारण ‘शहीदों की नगरी’ के नाम से मशहूर है. अनुज ने दिप्रिंट को बताया, “मैं वायुसेना में भर्ती परीक्षाओं की तैयारी के लिए यहां आया हूं.”

दूसरा युवक चमन लाल हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के नारनौल तहसील के नांगल काठा गांव का रहने वाला है. उन्होंने कहा, “मैंने (अग्निवीर के लिए) लिखित परीक्षा पहले ही पास कर ली है. मैं यहां ग्रुप डिस्कशन, क्षमता परीक्षण की तैयारी के लिए आया हूं.”

उनके वार्डन सुरिंदर सिंह ने कहा, “(शेखावाटी डिफेंस) अकादमी की देखरेख भाजपा नेता राजेश कुमार दहिया के पास है, जिन्होंने नवंबर 2023 में राजस्थान की पिलानी विधानसभा सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन असफल रहे. अब इसकी देखभाल उनके बेटे मनीष दहिया करते हैं.”

सिंह ने बताया, सेना भर्ती के लिए युवाओं को तैयार करने के लिए 2005 में शुरू की गई अकादमी इस क्षेत्र में सबसे प्रतिष्ठित है, लेकिन पहले अकादमी में “200 या अधिक हॉस्टलर्स और इतनी ही संख्या में डे स्कॉलर” हुआ करते थे, लेकिन सरकार द्वारा अग्निपथ योजना शुरू करने के बाद से “किसी भी सत्र में यह संख्या 30-40 से अधिक नहीं बढ़ी”.

सिंह ने कहा, “यह अंग्रेज़ी मीडियम के छात्रों का हॉस्टल है. हमारे पास ऐसी एक और इमारत है. अब, इस भवन में हमारे केवल दो छात्र हैं क्योंकि यह सत्र की शुरुआत है.”

चिड़ावा में झुंझुनू रोड पर शेखावाटी डिफेंस अकादमी का प्रवेश द्वार | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंटअग्निपथ योजना ने न केवल शेखावाटी डिफेंस अकादमी बल्कि ऐसे कई केंद्रों को प्रभावित किया है. शहर के चारों ओर 30 से अधिक केंद्रों के बावजूद चिड़ावा डिफेंस कोचिंग सेंटर (हब) था. सिंह ने बताया, उनमें से आधे बंद हो गए हैं, जबकि कई अन्य ने अग्निपथ योजना की शुरुआत के बाद से अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी पढ़ाना शुरू कर दिया है.

सेना में भर्ती के आकांक्षी कोचिंग सेंटरों में अंग्रेज़ी, हिंदी, गणित, फिजिक्स, रीज़निंग (तर्कशक्ति), सामान्य ज्ञान, जागरूकता और शारीरिक परीक्षण की तैयारी करने आते हैं. इसकी एक साल की फीस एक लाख रुपये से अधिक है और इसमें रहना, खाना और ट्रेनिंग शामिल है. सिंह ने कहा, शेखावाटी डिफेंस अकादमी में यह 1.2 लाख रुपये है. हालांकि, कई लोगों के लिए सेना की नौकरी के लिए कोचिंग पर इतना खर्च करने का कोई मतलब नहीं है जो नियमित भी नहीं है और इसमें अन्य लाभ भी नहीं मिलते.

सिंह ने बताया कि कोचिंग सेंटरों की स्थिति इतनी खराब है कि “मालिकों के लिए स्टाफ सदस्यों को सैलरी देना मुश्किल हो गया है”. उन्होंने कहा, हॉस्टल और अकादमी किराए पर हैं और मौजूदा वित्तीय बाधाओं के कारण किराए के भुगतान में देरी हो रही है.

हिंदी मीडियम के छात्रों के लिए हॉस्टल के वार्डन सीता राम ने कहा कि अब तक 15 छात्र यहां आए हैं. उन्होंने बताया, “अग्निपथ योजना से पहले, हॉस्टल में 225 छात्र रहते थे, लेकिन आखिरी बैच में, हमारे पास केवल 35 थे.”

अंग्रेज़ी मीडियम के छात्र अनुज और चमन लाल, राम के छात्रावास में प्रतिदिन आते हैं. सीता राम ने कहा, “जब तक हमारे पास छात्रों की पर्याप्त संख्या नहीं हो जाती, हम इस इमारत में ही रसोई चला रहे हैं. उन्हें नाश्ते, दोपहर के भोजन और रात के खाने के लिए यहां आना होता है.”

अनुज ने कहा कि अग्निपथ योजना का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इसका असर युवाओं की वैवाहिक संभावनाओं पर पड़ रहा है. उन्होंने कहा, “कोई भी अपनी बेटी की शादी तब तक नहीं करता जब तक कि लड़का कमाने वाला न हो. पहले, सशस्त्र बलों में भर्ती एक अच्छी दुल्हन खोजने की गारंटी थी.”

उन्होंने कहा, “अब, विवाह योग्य लड़कियों के माता-पिता अपनी बेटियों की शादी अग्निवीरों से नहीं करना चाहते हैं. उनका कहना है कि वे अपनी बेटियों की शादी केवल उन्हीं लोगों से करेंगे जो अग्निवीर बनने के चार साल पूरे हो जाने के बाद सशस्त्र बलों में शामिल होने वाले अंतिम 25 प्रतिशत में शुमार होंगे.”

चिड़ावा शहर के बाज़ार में अपने ऑफिस में शेखावाटी डिफेंस अकादमी की देखभाल करने वाले मनीष दहिया ने कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) कोर्स में दाखिले की तलाश कर रही एक लड़की के माता-पिता को उसे अपने केंद्र में शामिल होने के लिए मनाने की कोशिश की.

दहिया ने कहा, “सशस्त्र बलों में भर्ती के लिए छात्रों की कमी को देखते हुए, हमने एसएससी, रेलवे, दिल्ली पुलिस और हरियाणा पुलिस के लिए पढाना शुरू किया है. युवाओं का रुझान अब ऐसे कोर्स की ओर अधिक है.”

बीजेपी नेता राजेश कुमार दहिया के बेटे मनीष दहिया कोचिंग सेंटर का प्रबंधन संभालते हैं | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंटहालांकि, दहिया ने कहा, “भले ही अग्निपथ योजना का ऑप्शन चुनने वाले युवाओं की संख्या पहले की तुलना में कम है, सरकार भर्ती प्रक्रियाओं की आवृत्ति बढ़ाकर अधिक मौके देने की कोशिश कर रही है. पहले साल में एक बार की तुलना में अब हमें महीने में चार बार भर्ती विज्ञापन देखने को मिलते हैं.”

पूछे जाने पर कि क्या नवंबर 2023 में चुनावी नतीजों के पीछे अग्निपथ का मुद्दा हो सकता है, दहिया ने कहा कि उनके पिता केवल इसलिए चुनाव हार गए क्योंकि पूर्व भाजपा विधायक कैलाश चंद मेघवाल, जिन्हें भाजपा ने टिकट नहीं दिया था, ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और उनके पिता की पिच खराब कर दी.

चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, भाजपा के राजेश कुमार दहिया को 57,265 वोट मिले, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार पितराम सिंह काला को 70,905 वोट मिले थे.

मनीष दहिया केंद्र में विविधता ला रहे हैं, लेकिन उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि जहां तक डिफेंस कोचिंग की बात है तो चीज़ें बेहतर होंगी.

दहिया ने भाजपा के राज्यसभा सांसद घनश्याम तिवाड़ी के बयान को दैनिक भास्कर (चिड़ावा संस्करण) की एक क्लिपिंग में दिखाते हुए कहा, “सरकार पहले ही कह चुकी है कि वे चार साल बाद बनाए रखने वाले अग्निवीरों का प्रतिशत 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने जा रही है.”

जैसे-जैसे कोचिंग सेंटरों में छात्रों की संख्या में गिरावट देखी जा रही है, सेना में अग्निवीरों के नवीनतम बैच में आवेदकों की रिकॉर्ड संख्या देखी गई है. दिप्रिंट ने पहले भी रिपोर्ट दी है कि इस साल पुरुषों और महिलाओं सहित 12.8 लाख युवाओं ने अग्निवीर बनने के लिए आवेदन किया था – 2023 के 11.3 लाख आवेदकों के मुकाबले लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि.

 


अन्य नौकरी उपलब्ध नहीं

हरियाणा के साथ राजस्थान की सीमा पर झुंझुनू के पचेरी कलां गांव में एक चाय की दुकान के बाहर बैठे, याद राम यादव ने दिप्रिंट को बताया कि झुंझुनू और आसपास के जिलों के लोगों के पास खेती के अलावा कुछ भी नहीं है और इसलिए वे सरकारी नौकरियों की तलाश में रहते हैं.

शेखावाटी डिफेंस अकादमी का विज्ञापन | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंटयादव ने कहा, “मिट्टी शुष्क और कम उपजाऊ है. सिंचाई का कोई साधन नहीं है. मानसून दुर्लभ है. हमारे यहां एकमात्र फसल बाजरा और मूंग है, लेकिन, यह परिवार चलाने के लिए काफी नहीं है.”

उन्होंने कहा, “जब तक सरकार ने अग्निपथ योजना को अधिसूचित नहीं किया, तब तक सशस्त्र बलों में शामिल होना सबसे अच्छा विकल्प था – यही कारण है कि सशस्त्र बलों में योगदान देने के मामले में झुंझुनू देश के सभी जिलों में शीर्ष पर है, लेकिन अग्निपथ ने लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया – और अब यही कारण है कि यह चुनावों में एक प्रमुख मुद्दा बन कर रह गया है.”

उसी चाय की दुकान पर बैठे पचेरी कलां से करीब दो किलोमीटर दूर रसूलपुर गांव के युवक परविंदर यादव ने कहा कि उनके छोटे भाई ललित यादव का हमेशा से सपना रहा है कि उसे सशस्त्र बलों में शामिल होना है.

यादव ने कहा, “हालांकि, एक बार जब उन्होंने पात्र आयु प्राप्त कर ली, तो कोविड-19 के कारण भर्ती निलंबित कर दी गई. उसे हटाकर सरकार अग्निपथ योजना लेकर आई. अब उसे सेना की नौकरी में कोई दिलचस्पी नहीं है, जो चार साल तक चलेगी और जल्द ही वे पात्र उम्र से अधिक का हो जाएगा.”

झुंझुनू के भुकाणा गांव के निवासी मोहर सिंह जो सेना से मानद कैप्टन के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं, ने कहा, “हमारा जिला न केवल सशस्त्र बलों में सबसे अधिक संख्या में सैनिकों के योगदान के लिए जाना जाता है, बल्कि देश के लिए सबसे अधिक संख्या में अपने प्राणों का बलिदान देने वाले सैनिकों के कारण झुंझुनू को ‘शहीदों की नगरी’ भी कहा जाता है.”

उन्होंने कहा: “कोई भी नौकरी के लिए अपने जीवन का बलिदान करने की समान इच्छा की उम्मीद नहीं कर सकता है.”

झुंझुनू के ढंढेरी गांव के निवासी शाहीन खान ने कहा कि उनके गांव में 17 शहीद हैं. उनके पिता उनमें से एक हैं – मेजर महमूद हसन खान ने 14 दिसंबर 1971 को दारुचियन की लड़ाई में देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी और उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया.

शाहीन खान ने कहा, “इस क्षेत्र के लोग बहादुर हैं और सशस्त्र बलों में देश की सेवा करने का जुनून रखते हैं. जब से सरकार अग्निपथ योजना लेकर आई है, तब से वही जुनून नज़र नहीं आ रहा है.”

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